किसानों के लिए किया जा रहा नील हरित काई का उत्पादन

सक्ती। जिले में किसानों को जैव उर्वरक एवं हरी खाद के उपयोग को बढ़ावा देने एवं संतुलित खाद का उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शासकीय कृषि प्रक्षेत्र रगजा में नील हरित काई का उत्पादन कार्य प्रारंभ किया गया है। कृषि विभाग द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र बिलासपुर से नील हरित काई का मदर कल्चर लाकर प्रक्षेत्र में निर्मित टैंकों में डाला गया है। फार्म से उत्पादित नील हरित काई का चूर्ण तैयार कर किसानों के खेतों में उपयोग किया जाएगा।
नोडल अधिकारी श्री सुमान सिंह पैकरा ने बताया कि शासन के निर्देशानुसार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने के उद्देश्य से जैव उर्वरक एवं हरी खाद के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि मिट्टी की उर्वरता क्षमता बढ़े और किसानों की लागत में कमी आए। नील हरित काई धान फसल हेतु नाइट्रोजन का उत्तम स्रोत है, जो 25–30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की पूर्ति करता है। यह हवा से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाती है, जिससे रासायनिक यूरिया की बचत होती है और उपज में 5–10 प्रतिशत वृद्धि होने की संभावना रहती है। इसके उपयोग से मृदा में कार्बनिक पदार्थों तथा अन्य पौध वृद्धि वर्धक रसायनों जैसे ऑक्सिन, जिबरेलिन, फाइटोहॉर्मोन, इण्डोल एसिटिक एसिड आदि की मात्रा में वृद्धि होती है, जिससे मृदा की जल धारण क्षमता में सुधार होता है।
धान की खेती में नील हरित काई का उपयोग ब्यासी एवं रोपा पद्धति दोनों में लाभदायक होता है। धान की ब्यासी स्थिति में चलाने के बाद अथवा रोपा वाले खेत में धान के पौधों को रोपने के 6 से 10 दिन के भीतर, नील हरित काई के 12–15 किलोग्राम सूखे चूर्ण को पूरे खेत में छिड़ककर उपयोग किया जाता है। उपयोग से पूर्व खेत में आवश्यकता से अधिक पानी निकालकर 8–10 सेमी पानी बनाए रखें तथा यह पानी कम से कम 15–20 दिनों तक स्थिर रखा जाए, जिससे काई का विकास एवं फैलाव सुचारू रूप से हो सके।
यदि धान के खेत में गहरे रंग के हरे रेशेदार स्थानीय काई दिखाई दे, जो फसल के लिए नुकसानदायक हो, तो उसे नष्ट करने के लिए नीला थोथा (कॉपर सल्फेट) का 0.05 प्रतिशत घोल (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव किया जाए। इसका छिड़काव हर तीन-चार दिन में दोहराने से हरा काई पूर्णतः नष्ट हो जाता है।




