सक्ती

पराली न जलाने किसानों से अपील, वैकल्पिक उपाय अपनाने पर दिया जोर

सक्ती। सक्ती जिला एक कृषि प्रधान जिला है। जिले की 85 प्रतिशत् से भी अधिक जनसंख्या कृषि कार्य पर निर्भर है। जिले में खरीफ के कुल रकबा 1.16 लाख हेक्टेयर में से 1.13 लाख हेक्टेयर में धान की फसल ली जाती है तथा कुल 0.29 लाख हेक्टेयर में रबी फसलों की खेती की जाती है। रबी फसलों की तैयारी हेतु खरीफ फसल कटाई के बाद खेतों में बची हुई पराली को जलाने की परम्परा हमारे पर्यावरण, स्वास्थ्य तथा भूमि की उर्वरता के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही है। पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिससे सांस, आँख एवं त्वचा से संबंधित गंभीर बिमारियां फैलती हैं इसके साथ ही मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और अगली फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है।

कृषि विभाग ने जिले के सभी कृषको से अपील किया है कि फसल कटाई के बाद खेतों में बची हुई पराली जलाने से परहेज करें तथा निम्न वैकप्लिक उपायों को अपनाएं। जिनमें मिट्टी पलटने वाले हल का उपयोग कर पराली को खेत में ही दबाया जा सकता है, जिससे वह खाद बन जाती है। पराली को सड़ाने के लिए वेस्ट डी कंपोजर का उपयोग किया जा सकता है, जिससे वह खाद में बदल जाती है। उन्नत कृषि यंत्र (जैसे-हैप्पी सीडर, सुपर सीडर तथा बेलर मशीन) उपकरण पराली को हटाकर बुवाई भी कर सकते हैं और उससे जमीन के नीचे दबा भी सकते हैं। इसके साथ ही पराली को गोशालाओं को दान किया जा सकता है या बायो गैस, फर्मल प्लांट में इस्तेमाल के लिए एग्रीगेटर्स को बेचा जा सकता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के द्वारा भी यह अनुशंसा की गई है कि कृषक “जलाने” की जगह इन-सिटू (मिट्टी में मिला देना) तथा एक्स-सिटू (बाहर लेकर जाना व उपयोग करना) तरीकों को अपनाए और उपलब्ध मशीनरी तथा जैव-उत्पादों का प्रयोग करें। शासन द्वारा भी पराली प्रबंधन हेतु विभिन्न अनुदान योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं का लाभ उठाएं और पर्यावरण संरक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। पराली जलाने पर जुर्माना का भी प्रावधान है, यह जुर्माना राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) अधिनियमों के तहत 5000 रुपए से 30000 रुपए तक जुर्माना का प्रावधान है।

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